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आर.जी.कर कांड : एक साल बाद भी हरे हैं जख्म, दंश झेल रहे दो परिवार

एक साल पहले जिस घटना में पूरे देश को उद्वेलित कर दिया था, उस वीभत्स घटना की यादें वक्त के साथ धुंधली होती जा रही है

08 Aug 2025

आर.जी.कर कांड : एक साल बाद भी हरे हैं जख्म, दंश झेल रहे दो परिवार

कोलकाता। कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में एक इंटर्न चिकित्सक की दुष्कर्म के बाद बेरहमी से हुई हत्या की वारदात हुए एक साल का वक्त गुजर चुका है लेकिन इस घटना से प्रभावित दो परिवारों के जख्म अभी भरे नहीं हैं। महज 25 किलोमीटर की दूरी परमौजूददो घर। एक में बेटी को खोने का गम और न्याय की आस तो दूसरे में खामोशी और बिखरी हुई स्मृतियां। उस भयावह रात बीते बारह महीने गुजर गये, लेकिन दोनों परिवारों के दिलों पर पड़े घाव आज भी हरे हैं।
उत्तर 24 परगना जिला स्थित पीड़िता का घर जहां बीते एक साल के दौरान हर दिन एक संघर्ष की तरह रहा है । एक साधारण सा मकान, जिसकी दीवारें अब भी उस ग़म को समेटे खड़ी हैं। यह घर है उस युवा डॉक्टर के माता-पिता का, जिसे आठ -नौ अगस्त 2024 की रात आर.जी. कर के सेमिनार कक्ष में दरिंदगी का शिकार बनाया गया था। पीड़ित के पिता की आंखों में आंसुओं के साथ एक अटूट संकल्प भी है कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उनका मानना है कि असली दोषी आज भी अस्पताल के अंदर घूम रहे हैं, और कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। वे कहते हैं अगर बेटी आज होती तो एमडी कर चुकी होती, अपने पैरों पर खड़ी होती।
जो घर पहले सहानुभूति जताने वालों से भरा रहता था, वहां अब सन्नाटा है।रिश्तेदार, पड़ोसी… सब धीरे-धीरे दूर हो गए हैं। किसी को झंझट में पड़ना नहीं है, क्योंकि सबको लगता है कि जो होना था वह हो चुका है । समाज की विडंबना देखिये कि वारदात के बाद कुछ महीनों तक जोर शोर से आंदोलन चलाया गया। बहुत से लोगों ने इस आंदोलन के जरिये अपने स्वार्थ सिद्धि की कोशिश की तो वहीं राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने अपने तरीके से लाभ उठानेे में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन नतीजा कुछ खास नहीं रहा। कुछ दिनों तक सड़कों पर मोमबत्ती जलाकर विरोध जताया गया और फिर धीरे धीरे सब मंद पड़ने लगा।
दूसरी तरफ मामले में दोषी करार दिये गये संजय राय के भवानीपुर स्थित घर का मंजर भी किसी विभीषिका से कम नहीं है। 55/बी, शंभुनाथ पंडित स्ट्रीट… एक साल पहले यहां कदम रखते ही कैमरों के फ्लैश और सवालों की बौछार हुआ करती थी। आज घर के दरवाजे पर पुराना लाल पर्दा लटका है, बस रंग अब फीका पड़ चुका है—मानो वक्त ने इसकी चमक सोख ली हो। अंदर, कोने में रखे संजय राय के जूतों पर मोटी धूल जमी है।
वृद्धा मां, जो बेटे के बारे में पूछने पर कहती हैं वो तो अपने पिता के पास है। वे यह भूल चुकी हैं कि उनके पति कई साल पहले इस दुनिया से जा चुके हैं। उनका मन अब अतीत की धुंध में खो गया है, जहां न अपराध है, न सजा… बस एक अधूरी स्मृति।
नाज़िम हिकमत की कविता का भाव यहां जीवंत हो उठता है कि बीसवीं सदी में इंसान के शोक की उम्र बमुश्किल एक साल होती है।
एक साल पहले जिस घटना में पूरे देश को उद्वेलित कर दिया था, उस वीभत्स घटना की यादें वक्त के साथ धुंधली होती जा रही है। इस सबके बीच
दो परिवार अपनी-अपनी पीड़ा का भार अकेले ढो रहे हैं।

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